बचपन जीवन का बहुत ही महत्त्वपूर्ण और यादगार समय होता है। बचपन के दिन खुशियों से भरे होते हैं। मैं बचपन में पूरे दिन मौज-मस्ती ही करती थी। हम बचपन में कबड्डी, खो- खो, गिल्ली-डंडा, छुपन- छुपाई आदि अनेकों खेल खेलते थे। और उस वक्त मैं बहुत शरारती हुआ करती थी। मुझे स्कूल जाना अच्छा लगता था, मैं पढ़ाई में भी अच्छी थी। मैं बचपन में हर प्रतियोगिता में भाग लेती थी। और हर प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त करती थी। मेंरे पिता भारतीय सेना में कार्यरत हैं, जिसके कारण हमे हर तीन सालों में एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना पड़ता है। इसके चलते मैंने चार स्कूल बदलीं है। पहले राजस्थान, फिर दिल्ली, उसके बाद झांसी और अब कोलकाता। इसके चलते मेरा बचपन आनंद से भरपूर रहा है। अलग-अलग जगह पर अलग- अलग लोग, विभिन्न प्रकार की संस्कृतियां और अनुष्ठान, हर जगह विभिन्न प्रकार के खान-पान और भी कई चीजें देखने को मिलती है। मेरे बहुत से दोस्त भी बने, जैसे- काजल, सयन्तिका, सिद्धी, देबन्विता, निधि, निकिता आदि।
बचपन की एक अन्य घटना मुझे अभी तक याद है। उन दिनों मेरी तीसरी कक्षा की वार्षिक परीक्षा चल रही थी। हिंदी की परीक्षा में हाथी पर निबंध लिखने का प्रश्न आया था। निबंध लिखने के क्रम में मैंने ‘चल-चल मेरे हाथी’ वाली फिल्मी गीत की चार पंक्तियाँ लिख दीं।
इसकी चर्चा पूरे विद्यालय में हुई। शिक्षकगण तथा माता-पिता सभी ने हँसते हुए मेरी प्रशंसा की। परंतु उस समय मेरी समझ में नहीं आया कि मैंने अच्छा किया या बुरा।
बचपन में मुझे मेरे दादाजी और घर के अन्य सदस्यों के द्वारा खूब चॉकलेट और मिठाई दी जाती थी और कोई भी त्योहार आता था तो हमें किसी ना किसी व्यक्ति के जरिए नए कपड़े भी त्योहारों पर पहनने के लिए प्राप्त होते थे। इसके अलावा हमें अक्सर रविवार के दिन घूमने के लिए भी लेकर जाया जाता था क्योंकि रविवार के दिन छुट्टी होती थी।
मेरा स्वभाव बहुत ही दयालु था। मै मेरे दोस्तों, भाइयों-बहनों से अगर कभी लड़ाई-झगड़ा कर भी लेती थी, तो लड़ने के बाद, मुझे बहुत बुरा महसूस होता था। तथा मेरी इस हरकत के कारण मेरे परिवार के लोग भी मुझे डांटते थे। मैं घर के साथ-साथ विद्यालय मे भी सबसे अच्छी तथा समझदार लड़की थी। मैं हर बार मेरे विद्यालय में श्रेष्ठ रहती थी। जिसका प्रमुख कारण मेरा पढ़ाई के प्रति लगाव तथा शिक्षकों द्वारा अच्छा ज्ञान तथा परिवार का अच्छा सहयोग था। इस प्रकार के माहौल होने के कारण मैं बचपन से ही किताबों को ज्यादा पढ़ा करती थी। जिसके कारण मुझे किताब पढ़ना अच्छा लगता था। और आज भी मुझे किताब पढ़ना सबसे ज्यादा अच्छा लगता है। मेरे बचपन की कई यादें हैं। जिसमें कई प्रिय लगती हैं, कई अप्रिय भी थी।
सच में बचपन जीवन का बहुत ही महत्त्वपूर्ण समय होता है। बचपन में इतनी चंचलता और मिठास भरी होती है कि हर कोई फिर से बचपन को जीना चाहता है। बचपन में वह धीरे-धीरे चलना, गिर पड़ना और फिर से उठकर दौड़ लगाना बहुत याद आता है।
मोनिका, नौवीं 'स'
केंद्रीय विद्यालय कमान अस्पताल, अलीपुर कोलकाता।
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