बचपन के दिन बहुत रोमांचक और मजेदार होते हैं। अपने बचपन में मैंने कई यादगार काम किए जो बड़े होने पर बस एक याद बनकर रह गए। जब मैं पैदा हुआ तब हर तरफ बस पुराने खयालात वाले व्यक्ति ही मिलते थे। मेरी दो बहने हैं, मेरी बहनों के बाद सबको बस एक लड़के का ही इंतजार था। जब मैं पैदा होने वाला था तब सभी ने मन्नतें रख लीं कि लड़का ही पैदा हो। पता नहीं उन मन्नत के कारण मुझे कितनी बार अपना मुंडन कराना पड़ा है। फिर मैं पैदा हुआ। सभी बहुत खुश हुए। हालांकि अब यह लड़के लड़कियों में भेद की बुरी मानसिकता नहीं है। परंतु उस समय केवल लड़के के पैदा होने पर ही उत्सव मनाया जाता था। मुझे अभी भी मेरी मां सुनाती है कि मेरे पैदा होने पर मेरी नानी ने पंडित जी को सोने का सिक्का दिया था और मेरे पिताजी ने पूरे इलाके में रसगुल्ले बांटे थे। मैं अभी भी सोचता हूं कि मेरी बहनों के पैदा होने पर वैसा उत्सव क्यों नहीं मनाया गया। जब मेरी बहनों ने यह सब देखा होगा तो वह भी दुखी हुई होंगी कि उनके पैदा होने पर इतना सब क्यों नहीं हुआ।
जब मैं 5 साल का हुआ तो पढ़ाई करने के लिए मेरी मां ने मेरा दाखिला कोलकाता के केंद्रीय विद्यालय कमान अस्पताल में करा दिया। तब मेरे पिता हमारे साथ नहीं रहते थे। उनको काम की खातिर हम सब से दूर, असम में रहना पड़ता था। मेरे पिता के असम में होने के कारण मेरी मां को ही हमारी सारी जिम्मेदारी उठानी पड़ती थी। पहली कक्षा तो मैंने केंद्रीय विद्यालय कमांड अस्पताल में ही पूरी की, लेकिन दूसरी कक्षा में जाने के बाद मेरे पिताजी का ट्रांसफर जम्मू हो गया और हम सबको लेकर वे कोलकाता से बहुत दूर जम्मू चले गए।
जैसा अखबारों, टीवी चैनलों और लोगों से सुना था, जम्मू शहर उन सब बातों से विपरीत था। सब कहते थे कि जम्मू कश्मीर में अक्सर आतंकवादी हमले होते रहते हैं, वहां कब हमला हो जाए कुछ पता नहीं है, वहां के लोग अच्छे नहीं हैं, लेकिन जम्मू-कश्मीर जाकर पता चला कि जम्मू जन्नत से कम नहीं है। कुछ महान व्यक्तियों ने कहा है कि कश्मीर जन्नत है। उन्होंने यह बात जरूर सोच समझकर और जम्मू-कश्मीर की सुंदरता को साक्षात अनुभव करके ही कहा होगा। जाहिर है उनकी यह बात जम्मू-कश्मीर में रहने वाले व्यक्तियों को समझ आ गई होगी किंतु जो व्यक्ति उसकी सुंदरता से अपरिचित है उन्हें यह बात कहां समझ में आने वाली। जब हम जम्मू जा रहे थे तब मैंने यह सोचा कि यह कहां जा रहे हैं हम, काश पिताजी का ट्रांसफर वापस कोलकाता हो जाए। किंतु जम्मू जाने के बाद वहां से वापस आने का मन नहीं करता था। वहां रहते-रहते कब 8 साल बीत गए पता ही नहीं चला। पिताजी ने हमें जम्मू कश्मीर में हर जगह अच्छे से घुमाया और वहां 8 साल रहकर ऐसा लगने लगा था कि जम्मू-कश्मीर अपना ही शहर है। वहां रहकर कभी ऐसा लगा ही नहीं कि जम्मू कश्मीर आतंकवादियों का शहर है। वहां 8 साल रहने के बावजूद हमने कभी कोई गोलीबारी या आतंकवादी हमले के बारे में ना तो सुना और ना ही देखा। फिर पता चला कि जम्मू-कश्मीर को लोगों ने यूं ही बदनाम कर रखा है। पता नहीं क्यों पर अभी भी लोगों से जम्मू कश्मीर के बारे में कुछ पूछने पर लोगों के मुंह से आतंकवादी शब्द निकलता ही है। जब हम वहां रहते थे तब किसी भी रिश्तेदार को जैसे ही पता चलता था कि हम जम्मू कश्मीर में है वह तुरंत ही हमें फोन करके यह पूछते थे कि वह जगह सुरक्षित नहीं है ऐसी जगह पर क्या करने गए हो, क्यों जान को हथेली पर लेकर चल रहे हो। हमें यह सुनकर आश्चर्य होता था कि केवल टीवी, अखबार व लोगों की बातों ने ही जम्मू-कश्मीर को उसकी असलियत से कितना भिन्न कर दिया है। जब जम्मू कश्मीर से 370 धारा हटी, तब वहां के लोगों ने जोरों शोरों से उत्सव मनाया। वहां के लोगों को देखकर कभी लगा ही नहीं कि वह दूसरों से अलग है। उनके साथ रहकर, उनके सोच-विचार, रहन-सहन और आम जिंदगी बाकी जगह के लोगों से काफी अच्छी लगी।
8 साल 5 महीने बाद मेरे पिताजी का ट्रांसफर फिर से कोलकाता हो गया। हममें से किसी का भी मन वहां से जाने का नहीं था। वहां के लोगों से दूर जाना हमारे लिए काफी मुश्किल हो गया था। हमें बाकी जगहों से ज्यादा शान्ति, जम्मू और कश्मीर में ही मिलती थी। जम्मू कश्मीर से ज्यादा शांत जगह हमने देखी ही नहीं थी। लेकिन क्या करते, पिताजी की नौकरी का सवाल था, तो वापस कोलकाता जैसे भीड़भाड़ और शोर-शराबे वाली जगह में जाना ही पड़ा। अब कलकत्ता आने के बाद मन करता है कि काश हम फिर से जम्मू वापस जा सके और फिर उस जगह को कभी छोड़कर कहीं ना जाए। कोलकाता आने के बाद हमें याद आती है उस जम्मू-कश्मीर के पहाड़ों वाले हसीन इलाकों की, याद आती है वहां के सीधे-साधे और मन को जीत लेने वाले लोगों की, याद आती है वहां की अनंत शांति की और याद आती है वहां के अत्यंत सुंदर वह मनमोहक वातावरण की।
कृष्णा मंडल, नौवीं 'स'
केंद्रीय विद्यालय कमान अस्पताल, अलीपुर कोलकाता
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