Friday, 4 November 2022

वैष्णवी माने की कविताएं

 कागज़ के चंद टुकड़े


कभी-कभी सोचती हूं

कुछ पाने की क्यों इतनी होड़ है

हर कदम पर एक नया मोड़ है

मानो जिंदगी जिंदगी नहीं

एक अंधी दौड़ है।


थक से गए हैं सभी

खुद से और जिंदगी की लड़ाई से

होश आते ही, आंख खुलते ही

जिंदगी शुरू होती है बस पढ़ाई से।


बचपन से आज तक

क्यों इतनी दौड़-धूप है

क्या जिंदगी का यही एक रूप है?


हर तरफ टेंशन, परेशानी,

सुकून नहीं कहीं

क्यों जमाने में हो रहा है ऐसा

सरकारी मुहर लगे

कागज के चंद टुकड़ों के लिए

जिसे लोग कहते हैं पैसा।

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ज़िद 


ज़िद है तो इंसान है

नहीं तो बेजान है

पर अगर ज़िद हो सच्ची

तो देती हर इंसान को पहचान है

ज़िद है तो इंसान है

ज़िद है तो इंसान है।


ज़िद होती है परिंदों की

जिन्हें बिना मंजिल के न आराम है

ज़िद है तो इंसान है

ज़िद है तो इंसान है।


ज़िद होती है किसान की

इस चमकती बिजली में

कड़कती धूप में

सर्दी भी बेहिसाब होती है

पर करता है कड़ी मेहनत

जब तक झलक ना दिख जाए

अपनी कड़ी मेहनत के ईनाम की

ज़िद होती है किसान की।


ज़िद होती है मां की

वह दर्द भी सहती है

पर फिर भी कुछ ना कहती है

सौ दुखों के बाद भी

रहती है वह हंसती-सी

ज़िद होती है मां की।

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कोशिश


तू जिंदगी को जी

उसे समझने की 

कोशिश न कर।

सुंदर सपनों के ताने-बाने बुन

उसमें उलझने की 

कोशिश न कर।


चलते वक्त के साथ तू भी चल

उसमें सिमटने की 

कोशिश न कर।


अपने हाथों को फैला 

खुलकर सांस ले

अंदर ही अंदर घुटने की 

कोशिश न कर।


मन में चल रहे 

युद्ध को विराम दे

ख्वामखाह खुद से लड़ने की 

कोशिश न कर।


कुछ बातें 

वक्त पर छोड़ दे

सब कुछ खुद सुलझाने की 

कोशिश न कर।


जो मिल गया 

उसी में खुश रह

जो सुकून छीन ले उसे पाने की 

कोशिश न कर।

रास्ते की सुंदरता को पहचान

मंजिल पर जल्दी पहुंचने की 

कोशिश न कर।


  • वैष्णवी माने, नौवीं-स

केंद्रीय विद्यालय कमान अस्पताल, अलीपुर कोलकाता।


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